
राजस्थान में सरकारी भर्तियों में एडजस्ट करने से पहले संविदा कर्मियों की परिभाषा तो तय हो।
कांग्रेस के शासन में सरपंच की जाति के आधार पर स्कूलों में पैराटीचर्स नियुक्त हुए।
सिफारिशी संविदा कर्मियों की वजह से क्या योग्य और मेहनती युवाओं के हितों पर कुठाराघात नहीं होगा?
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जनता का सच
स्टेट ब्युरो राधामोहन अग्रवाल
18 फरवरी को राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस की विधायक शिखा मील ने स्थानीय निकायों में संविदा कर्मियों की दुर्दशा का मुद्दा उठाया। सवाल का जवाब देते हुए शहरी विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि सरकार सरकारी भर्तियों में शिथिलता देकर संविदा कर्मियों को एडजस्ट करने की योजना बना रही है। संविदा कर्मियों की दुर्दशा से सरकार अवगत है। मंत्री खर्रा का बयान अपनी जगह है, लेकिन सरकारी नौकरियों में एडजस्टमेंट करने से पहले संविदा कर्मियों की परिभाषा तो तय होनी चाहिए। आज अनेक विभागों में जरूरत पड़ने पर अनुबंध के आधार पर कार्मिकों को अस्थायी नियुक्ति दे दी जाती है। इनमें से शिक्षा, चिकित्सा, जलदाय, ग्रामीण विकास, स्थानीय निकाय आदि विभाग प्रमुख हैं। इसके अलावा सरकार अपने कार्यों को ठेके पर भी देती है। संबंधित ठेकेदार भी अपने नजरिए से कार्मिकों की नियुक्ति करता है। इसके अलावा आंगनबाड़ी जैसे कार्यों के लिए भी अनुबंध पर कार्मिकों को रखा जाता है। संविदा या अनुबंध पर किस तरह कार्मिक रखे जाते हैं, इसका अंदाजा सरकारी स्कूलों में पैरा टीचर्स की नियुक्ति से लगाया जा सकता है। अशोक गहलोत ने वर्ष 1998 में पहली बार कांग्रेस के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सरकारी स्कूलों में पैरा टीचर्स की नियुक्ति सरपंच की जाति के आधार पर करवाई। यानी जिस ग्राम पंचायत में जिस जाति का सरपंच हैं, उसी जाति के व्यक्ति को पैराटीचर बनाया जाए। सब जानते हैं कि अनुबंध पर कार्मिकों की नियुक्ति योग्यता के बजाए सिफारिश पर होती है। राजस्थान में गत पांच बार से सत्ता में बदलाव हो रहा है। एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस की सरकार बन रही है। हर सरकार अपने अपने नजरिए से संविदा पर नियुक्तियां देती हैं। सवाल यह भी है कि यदि सिफारिशी संविदा कर्मियों को सरकारी भर्तियों में एडजस्ट किया जाएगा तो क्या योग्य और मेहनती युवाओं के हितों पर कुठाराघात नहीं होगा? छोटी से छोटी सरकारी नौकरी के लिए युवा कड़ी से कड़ी मेहनत करता है। स्कूल की पढ़ाई के साथ कोचिंग पर भी लाखों रुपया खर्च होता है। युवा अपना घर छोड़ महानगरों में कोचिंग के लिए रहते हैं। एक तरफ योग्य और मेहनती बेरोजगार युवा हैं तो दूसरी तरफ सिफारिशी संविदा कर्मी। सरकार को भर्तियों में संविदा कर्मियों के समायोजन से पहले योग्य और मेहनती युवाओं का भी ख्याल रखना चाहिए। राजस्थान में मौजूदा समय में एक लाख से ज्यादा संविदाकर्मी है। इनमें ठेका कर्मियों की संख्या शामिल नही ंहै। सरकार पहले यह तय करें कि वह किसे संविदा कर्मी मानती है। एक और स्थायी कर्मचारी को एक लाख रुपए से ज्यादा का वेतन मिल रहा है तो वहीं संविदाकर्मी को मुश्किल से 25 हजार रुपए प्रतिमाह मेहनताना मिल रहा है। जबकि संविदाकर्मी ज्यादा काम करता है। संविदा कर्मी के मुकाबले में सुविधा भी स्थाई कर्मियों को ज्यादा मिलती है। सरकार को कोई ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें संविदा कर्मियों को भी सम्मानजनक वेतन मिले और उनका भविष्य भी सुरक्षित हो।


