
*हिन्द-प्रशांत में चीन की दादागिरी और चतुष्पक्षीय संवाद का सच: भारत की संप्रभुता के साथ खड़ा समय*
डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक,मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर,सामाजिक कार्यकर्ता है।
हिन्द-प्रशांत क्षेत्र आज विश्व की धड़कन बन चुका है। दुनिया का 60% समुद्री व्यापार यहीं से गुजरता है, 3.5 लाख करोड़ डॉलर की वस्तुएं हर साल दक्षिण चीन सागर से निकलती हैं, और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 65% हिस्सा इसी क्षेत्र के देशों से आता है। ऐसे में यह इलाका केवल भूगोल नहीं, बल्कि 21वीं सदी की सत्ता का असली अखाड़ा है। यहीं पर चीन की मनमानी सबसे नंगी होकर सामने आई है। चतुष्पक्षीय संवाद यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह इसी मनमानी का जवाब है, पर सवाल यह है कि क्या केवल कूटनीति के वक्तव्य और नौसैनिक अभ्यास से बीजिंग की जमीनी सच्चाई बदली जा सकती है?
चीन का पूरा खेल तीन शब्दों में समझा जा सकता है: कब्जा, दबाव और इनकार। 2016 में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने साफ कहा कि चीन का नौ-रेखा दावा अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अवैध है। बीजिंग ने निर्णय को कागज का टुकड़ा बता कर फाड़ दिया। इसके बाद स्कारबोरो उथला क्षेत्र से लेकर स्प्रैटली द्वीप तक, चीन ने 3200 एकड़ से अधिक कृत्रिम द्वीप बना डाले। इन पर प्रक्षेपास्त्र आश्रय, लड़ाकू विमान के लिए हवाईपट्टी, रडार और पोत-रोधी प्राक्षेपिक प्रक्षेपास्त्र तैनात कर दीं। यह सब समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय 1982 का खुला उल्लंघन है, जिस पर खुद चीन ने हस्ताक्षर किए थे। अंतरराष्ट्रीय कानून को मानना तब तक ही है जब तक वह बीजिंग के हित में हो, वरना वह दादागिरी है।
यह दादागिरी केवल समुद्र तक सीमित नहीं। गलवान घाटी 2020 में भारत ने अपने 20 जवानों की शहादत से देखा कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बदलने की चीन की आदत कितनी खतरनाक है। भूटान के डोकलाम में सड़क, नेपाल में सीमा स्तंभों को खिसकाना, अरुणाचल प्रदेश में गाँव बसाकर नाम बदलना, यह सब एक ही ढर्रा है। संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की बात बीजिंग केवल तब करता है जब ताइवान का जिक्र हो। बाकी जगह वह खुद विस्तारवादी है।
व्यापार को हथियार बनाना चीन की दूसरी रणनीति है। ऑस्ट्रेलिया ने जब वैश्विक महामारी की स्वतंत्र जांच की मांग की, तो बीजिंग ने मदिरा, जौ, कोयला और झींगा मछली पर 80% से 212% तक शुल्क ठोक दिए। लिथुआनिया ने ताइवान को दूतावास खोलने दिया तो चीन ने उसके निर्यात को पूरी तरह रोक दिया। जापान के सेनकाकू द्वीप विवाद में दुर्लभ मृदा तत्वों का निर्यात रोक दिया गया। यह आर्थिक जबरदस्ती है। रेशम मार्ग पहल के नाम पर श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह 99 साल के लिए पट्टे पर लेना, पाकिस्तान में ग्वादर, जिबूती में सैन्य अड्डा, कंबोडिया के रीम में नौसैनिक सुविधा, यह सब ऋण-जाल कूटनीति का सच है। छोटे देश संप्रभुता गिरवी रख रहे हैं।
अवैध गतिविधियों में भी चीन की भूमिका कड़वी है। दक्षिण चीन सागर में चीनी नागरिक सैन्य टुकड़ी की सैकड़ों नौकाएं फिलीपींस और वियतनाम के मछुआरों को खदेड़ती हैं। संयुक्त राष्ट्र के प्रतिवेदन बताते हैं कि उत्तर कोरिया को प्रतिबंधों के बावजूद तेल और कोयला चीन के जहाज समुद्र में ही हस्तांतरित करते हैं। अंतरजाल आक्रमण, बौद्धिक संपदा चोरी, नशीली दवा के रासायनिक पूर्ववर्ती का निर्यात, यह सब उस धूसर-क्षेत्र युद्ध का हिस्सा है जिसे बीजिंग अंतरराष्ट्रीय नियमों से बाहर रहकर लड़ता है।
अब चतुष्पक्षीय संवाद की बात। 2007 में बना, 2017 में पुनर्जीवित हुआ यह समूह चीन को रोकने के लिए है, यह बात अब कोई छुपाता नहीं। मालाबार अभ्यास में चारों देशों की नौसेनाएं एक साथ आती हैं। 2022 में चतुष्पक्षीय संवाद ने हिन्द-प्रशांत समुद्री क्षेत्र जागरूकता शुरू किया ताकि अवैध मछली पकड़ने और अंधेरे पोत-परिवहन पर नजर रखी जाए। टीका मैत्री के तहत 1.2 अरब खुराक देने का वादा, अर्धचालक आपूर्ति शृंखला, महत्त्वपूर्ण खनिज, पाँचवीं पीढ़ी और खुली रेडियो अभिगम तंत्र पर साझेदारी, ये सब चीन का एकाधिकार तोड़ने की कोशिशें हैं।
पर जमीनी सच यह भी है कि चतुष्पक्षीय संवाद सैन्य गठबंधन नहीं है। कोई अनुच्छेद-पाँच जैसी सुरक्षा गारंटी नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के लिए ऑकस है, जापान के लिए अमेरिका से संधि है, पर भारत के लिए चतुष्पक्षीय संवाद कोई छतरी नहीं देता। भारत की नीति स्पष्ट है: रणनीतिक स्वायत्तता। हम किसी का पिछलग्गू बनकर चीन का मुकाबला नहीं करेंगे। हम अपने हितों के लिए खड़े हैं। और हमारे हित क्या हैं? खुला, स्वतंत्र, समावेशी हिन्द-प्रशांत जहां नियम सबके लिए बराबर हों। जबरन कब्जा नहीं। नौवहन की स्वतंत्रता। विवादों का शांतिपूर्ण समाधान। दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ की केंद्रीयता का सम्मान।
भारत का पक्ष इसलिए मजबूत है क्योंकि वह दोहरा खेल नहीं खेलता। हम चतुष्पक्षीय संवाद में हैं, पर शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स में भी हैं। हम रूस से तेल लेते हैं, पर अमेरिका से चालकरहित विमान भी। यह संतुलन सिद्धांतहीन नहीं, बल्कि 140 करोड़ लोगों के हितों की रक्षा है। चीन को यह बात चुभती है। इसीलिए सरकारी समाचारपत्र वैश्विक समय रोज लिखता है कि भारत अमेरिका के जाल में फंस रहा है। सच उल्टा है। भारत ने साफ कर दिया कि हिन्द-प्रशांत केवल चीन-अमेरिका की लड़ाई नहीं है। यह हमारे पड़ोस का सवाल है। अंडमान से 90 किलोमीटर दूर कोको द्वीप पर चीन की रडार सुविधा, मालदीव और श्रीलंका में पनडुब्बी ठहराव, बंगाल की खाड़ी में अनुसंधान पोत की आड़ में जासूसी, यह सब दिल्ली के दरवाजे पर खतरा है।
भविष्य का प्रभाव सीधा है। अगर चीन की टुकड़ा-टुकड़ा काटने की नीति चलती रही तो कल कोबाल्ट, लिथियम, अर्धचालक की पूरी शृंखला बीजिंग के हाथ में होगी। ताइवान पर हमला हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था 10% तक सिकुड़ सकती है। भारत के लिए खतरा दोगुना है: एक तरफ हिमालय, दूसरी तरफ हिंद महासागर। इसलिए भारत का चतुष्पक्षीय संवाद में रहना मजबूरी नहीं, रणनीति है। हम समुद्री क्षेत्र में सूचना साझा करेंगे, साजो-सामान समझौते करेंगे, पर जमीन पर लड़ाई अपनी लड़ेंगे। अग्निपथ, युद्ध-क्षेत्र कमान, परियोजना-75आई पनडुब्बी, विक्रांत और विशाल विमानवाहक पोत, निकोबार में अड्डा मजबूत करना, यह सब उसी तैयारी का हिस्सा है।
चीन की कूटनीति का सबसे बड़ा हथियार है भ्रम फैलाना। वह कहता है चतुष्पक्षीय संवाद एशियाई उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन है। वह कहता है भारत पड़ोसियों को भड़का रहा है। वह कहता है अमेरिका टकराव चाहता है। पर तथ्य यह है कि 2009 से 2023 के बीच चीन ने दक्षिण चीन सागर में 47 बार तटरक्षक और नागरिक सैन्य टुकड़ी से दूसरे देशों के जहाजों को टक्कर मारी है। फिलीपींस के सिएरा माद्रे जहाज पर पानी की बौछार, वियतनाम के तेल मंच पर धावा, इंडोनेशिया के नातुना में घुसपैठ, यह टकराव कौन कर रहा है?
राजनीति का तकाजा है कि बीजिंग को आईना दिखाया जाए। चतुष्पक्षीय संवाद देशों को आर्थिक ताकत बढ़ानी होगी। केवल वक्तव्य से जहाज नहीं रुकते। भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया की आपूर्ति शृंखला लचीलापन पहल, भारत-अमेरिका की महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पहल, महत्त्वपूर्ण खनिज के लिए ऑस्ट्रेलिया के साथ समझौता, ये कदम सही दिशा में हैं। पर गति धीमी है। चीन हर साल 20 से अधिक युद्धपोत बना रहा है। उसके पास 340 से ज्यादा जंगी जहाज हैं। चतुष्पक्षीय संवाद को मिलाकर भी संख्या बराबर नहीं होती। इसलिए असममित रणनीति चाहिए। अंडमान-निकोबार से मलक्का जलडमरूमध्य को नियंत्रित करना, डिएगो गार्सिया से लेकर गुआम तक साजो-सामान जाल, समुद्र के नीचे संवेदक, अंतरिक्ष से निगरानी, यह सब भारत के लिए जरूरी है।
आतंकवाद पर भी चीन का दोहरा चरित्र सामने है। संयुक्त राष्ट्र में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों को बचाना, लश्कर के साजिद मीर पर तकनीकी रोक लगाना, यह कैसी वैश्विक जिम्मेदारी है? जो देश अपने शिनजियांग में उइगरों पर नजर रखता है, वह पाकिस्तान के आतंकी ढांचे पर आंख मूंद लेता है। इसलिए भारत का यह कहना बिल्कुल सच है कि सुरक्षा अविभाज्य है। हिन्द-प्रशांत में नियम-आधारित व्यवस्था चाहिए तो हिमालय पर भी चाहिए।
अंत में खरा सच यही है: चीन ताकत की भाषा समझता है। सम्मान तभी मिलेगा जब सामने वाला मजबूत हो। चतुष्पक्षीय संवाद इसी मजबूती का मंच है, पर भारत की असली ताकत उसकी नौसेना, अर्थव्यवस्था और कूटनीतिक संतुलन है। हम युद्ध नहीं चाहते, पर दबेंगे भी नहीं। संप्रभुता बेचकर व्यापार नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय कानून किताबों में नहीं, समुद्र में लागू होना चाहिए। जबरन दादागिरी का जवाब झुककर नहीं, डटकर दिया जाता है। हिन्द-प्रशांत का भविष्य तय करेगा कि 21वीं सदी नियमों से चलेगी या बंदूक की नोक पर। भारत ने अपना पक्ष चुन लिया है: नियम, संतुलन और संप्रभुता। बाकी देशों को भी चुनना होगा। तटस्थता अब विकल्प नहीं।


