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ऋतुधर्म से राष्ट्रधर्म तक: एक शौचालय और सैनिटरी नैपकिन का महासंग्राम*


*ऋतुधर्म से राष्ट्रधर्म तक: एक शौचालय और सैनिटरी नैपकिन का महासंग्राम*

डाक्टर दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
आप देश के चर्चित लेखक, मोटिवेशनल स्पीकर,ट्रेनर,सामजिक कार्यकर्ता है।

देश के मान्यनी यसुप्रीम कोर्ट ने जब यह कहा कि सैनिटरी नैपकिन और शौचालय की कमी से लड़कियों की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए तो उसने केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं दिया। उसने भारत की आधी आबादी के भविष्य को कलम की नोक पर फिर से लिखा है। यह बात किसी कागज पर लिखी लकीर नहीं बल्कि उस दर्द की दवा है जो हर महीने करोड़ों बेटियों को चुपचाप सहना पड़ता है। बात केवल मासिक धर्म प्रक्रिया से उत्प्रेरित खून के धब्बों की नहीं है। बात उस अपमान की है जो एक बच्ची तब महसूस करती है जब स्कूल में टॉयलेट में ताला लगा हो या पानी न हो। बात उस लाचारी की है जब दो रुपये का पैड खरीदने के लिए भी उसे सोचना पड़े।

जमीनी हकीकत के आंकड़े चौंकाते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण पाँच के अनुसार भारत में 15 से 24 साल की केवल 64 प्रतिशत युवतियां ही स्वच्छता के सुरक्षित तरीके अपनाती हैं। यूनिसेफ बताता है कि पीरियड्स शुरू होने के बाद करीब 23 प्रतिशत लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। एक अन्य अध्ययन कहता है कि जिन स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और चालू शौचालय नहीं हैं वहां उनकी अनुपस्थिति 12 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। ग्रामीण भारत में तो हाल और बुरा है। कई स्कूलों में बने शौचालय या तो गोदाम बन गए हैं या उनमें पानी का कनेक्शन ही नहीं है। लड़कियों को मजबूरन खेतों में जाना पड़ता है। इससे संक्रमण का खतरा तो बढ़ता ही है साथ ही छेड़छाड़ और हिंसा का डर भी हर दिन साथ चलता है। मुफ्त पैड की योजना कई राज्यों में है पर जमीन पर वह या तो पहुंचती नहीं या पहुंचती है तो इतनी घटिया गुणवत्ता की कि इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है। दुकानदार भी कई बार गांव की लड़की को पैड बेचते समय ऐसी नजरों से देखता है मानो उसने कोई गुनाह कर दिया हो। यह सामाजिक पिछड़ापन है जो विज्ञान के युग में भी हमें जकड़े हुए है।

आर्थिक पहलू देखें तो एक लड़की का स्कूल छोड़ना केवल एक परिवार का नुकसान नहीं है। यह पूरे देश की अर्थव्यवस्था का नुकसान है। विश्व बैंक का अनुमान है कि लड़कियों की शिक्षा में एक साल का इजाफा उनकी भविष्य की आय को 10 प्रतिशत तक बढ़ा देता है। अगर 23 प्रतिशत लड़कियां केवल पीरियड्स के कारण पढ़ाई छोड़ रही हैं तो सोचिए हम हर साल कितनी लाख डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक और उद्यमी खो रहे हैं। एक पैड की कीमत दो रुपये है पर एक लड़की के स्कूल छोड़ने की कीमत पूरे समाज को कई लाख रुपये पड़ती है। मुफ्त बायोडिग्रेडेबल नैपकिन देना खर्च नहीं निवेश है। इससे स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बचेगा। गंदे कपड़े के इस्तेमाल से होने वाले संक्रमण के इलाज पर जो पैसा खर्च होता है वह बच जाएगा। लड़कियां स्वस्थ रहेंगी तो कार्यबल में भागीदारी बढ़ेगी। देश की जीडीपी सीधे बढ़ेगी। यह सीधा गणित है जिसे समझने के लिए किसी अर्थशास्त्री की जरूरत नहीं।

राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना कोई भी आदेश सफल नहीं होता। कोर्ट ने केंद्र को नोडल बनाया है और हर तीन महीने में निगरानी की बात कही है। यह बहुत जरूरी था। वरना होता यह है कि योजना बनती है, बजट पास होता है, पर फाइलों में दबकर रह जाता है। 15 अगस्त तक रिपोर्ट मांगना एक सख्त संदेश है कि अब बहाने नहीं चलेंगे। पंचायत से लेकर संसद तक हर जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है कि वह अपने क्षेत्र के स्कूल में जाकर टॉयलेट देखे। वहां पानी है या नहीं, साफ सफाई है या नहीं, पैड का डिब्बा भरा है या खाली। जब तक वोट मांगने वाला नेता खुद जाकर कमोड का ढक्कन उठाकर नहीं देखेगा तब तक बदलाव नहीं आएगा। राजनीतिक दलों को इसे चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए। क्योंकि जो दल बेटियों की शिक्षा की गारंटी देगा वही असल में विकास की गारंटी देगा।

अब जरा वैदिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देखें। हमारे शास्त्रों में नारी को शक्ति कहा गया है। ऋग्वेद में घोषा, लोपामुद्रा, अपाला जैसी विदुषियों का वर्णन है। मनुस्मृति में कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता निवास करते हैं। पर हमने क्या किया। हमने ऋतुधर्म को अपवित्रता से जोड़ दिया। मासिक धर्म एक जैविक प्रक्रिया है जो सृष्टि के निर्माण का आधार है। इसे शर्म का विषय बनाकर हमने अपनी ही जननी का अपमान किया है। वैदिक काल में रजस्वला स्त्री को आराम दिया जाता था क्योंकि वह शारीरिक कष्ट में होती थी। उसका मकसद उसे अछूत बनाना नहीं था। आज जरूरत है कि हम उस मूल भावना को फिर से समझें। मंदिर में प्रवेश पर रोक लगाने वाली सोच बदलनी होगी। जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी तब तक केवल शौचालय बनाने से बात नहीं बनेगी। अध्यात्म कहता है कि शरीर मंदिर है। उस मंदिर को स्वच्छ रखना पहला धर्म है। इसलिए स्कूल में साफ शौचालय होना भी एक धार्मिक कार्य है।

कूटनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा भारत की छवि से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और लैंगिक समानता दोनों शामिल हैं। दुनिया हमें तब महाशक्ति मानेगी जब हमारी बेटियां बिना डर के स्कूल जा सकेंगी। कई अफ्रीकी देशों ने भारत से सस्ते सैनिटरी पैड बनाने की तकनीक सीखी है। अगर हम अपने ही देश में इसे पूरी तरह लागू कर दें तो हम पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन सकते हैं। यह स्वच्छ भारत अभियान का अगला चरण है। यह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का असली मतलब है।

स्वास्थ्य के नजरिए से देखें तो गंदे कपड़े का इस्तेमाल करने से रीप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इंफेक्शन का खतरा 70 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यह संक्रमण आगे चलकर बांझपन का कारण भी बन सकता है। एक स्वस्थ मां ही स्वस्थ राष्ट्र को जन्म देती है। इसलिए हर पैड जो एक लड़की तक पहुंचता है वह वास्तव में आने वाली पीढ़ी को बीमारी से बचाता है। स्कूलों में पैड वेंडिंग मशीन और इन्सिनरेटर लगाना उतना ही जरूरी है जितना ब्लैकबोर्ड लगाना। शिक्षकों को भी प्रशिक्षित करना होगा ताकि वे इस विषय पर खुलकर बात कर सकें। जब तक शिक्षक खुद शर्माएगा तब तक छात्रा कैसे सवाल पूछेगी।

विकास का कोई भी मॉडल तब तक अधूरा है जब तक उसमें आधी आबादी पीछे छूट जाए। सड़क, बिजली, रेल सब जरूरी हैं पर अगर लड़की स्कूल ही नहीं जा पाई तो वह इन सबका इस्तेमाल कैसे करेगी। असली विकास वह है जब एक गांव की लड़की बिना झिझक दुकान पर जाकर पैड मांगे और दुकानदार उसे इज्जत से दे। असली विकास वह है जब स्कूल का चपरासी टॉयलेट का ताला खोलकर रखे न कि प्रिंसिपल के आने पर खोले।

भविष्य की परिकल्पना करें। अगर यह आदेश पूरी तरह लागू हो गया तो 2035 तक भारत में लड़कियों की साक्षरता दर लड़कों के बराबर हो जाएगी। ड्रॉपआउट रेट पांच प्रतिशत से नीचे आ जाएगा। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी जो आज केवल 25 प्रतिशत है वह 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि भारत की जीडीपी में कई लाख करोड़ रुपये का इजाफा। गांवों से पलायन रुकेगा क्योंकि पढ़ी लिखी लड़की वहीं रोजगार पैदा करेगी। बाल विवाह अपने आप कम हो जाएंगे क्योंकि पढ़ने वाली लड़की अपने हक के लिए खड़ी होगी।

पर यह सब तभी होगा जब हम इसे कठोर कसौटी पर कसेंगे। केवल आदेश से काम नहीं चलेगा। हर जिले के कलेक्टर की सालाना गोपनीय रिपोर्ट में यह बिंदु जोड़ा जाए कि उसके जिले के कितने स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट में पानी आ रहा है। हर विधायक निधि का 10 प्रतिशत हिस्सा स्कूलों में स्वच्छता पर खर्च करना अनिवार्य किया जाए। पैड की गुणवत्ता की जांच के लिए हर तहसील में लैब हो। जो ठेकेदार घटिया पैड सप्लाई करे उसे काली सूची में डाला जाए। सोशल ऑडिट हो। लड़कियां खुद बताएं कि उन्हें सुविधा मिल रही है या नहीं। मोबाइल ऐप बने जहां फोटो खींचकर शिकायत की जा सके और सात दिन में कार्रवाई हो।

अंत में बात सिर्फ नैपकिन या ईंट सीमेंट के ढांचे की नहीं है। बात उस सोच की है जो तय करती है कि बेटी बोझ है या वरदान। सुप्रीम कोर्ट ने कलम से रास्ता दिखा दिया है। अब समाज को कदम बढ़ाना है। जब तक एक भी बच्ची पीरियड्स के कारण स्कूल का गेट बंद देखती है तब तक आजादी अधूरी है। क्योंकि शिक्षा का अधिकार केवल कानून की किताब में लिखा अधिकार नहीं है। यह जीने का अधिकार है। और जीने के लिए सांस के साथ साथ सम्मान भी चाहिए। शौचालय का दरवाजा उस सम्मान की पहली कुंडी है। उसे खोलना ही होगा।

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