
शौर्य, सेवा और संघर्ष की अमर गाथा: शहीद आनरेरी कैप्टन हरि सिंह परमार को मिला न्याय
सच्चा शौर्य केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध डटे रहने में भी निहित होता है:विजय कुमार पाण्डेय
आनरेरी कैप्टन हरि सिंह परमार की जीवन यात्रा भारतीय सेना के अदम्य साहस, अनुशासन और समर्पण की एक ऐतिहासिक मिसाल है। उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद से आने वाले हरि सिंह परमार ने वर्ष 1963 में राजपुताना राइफल्स की मैकेनाइज्ड रेजीमेंट में भर्ती होकर सैन्य सेवा की शुरुआत की। सेना में शुरुआती समय से ही उन्होंने अपने अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और युद्धक निपुणता से उच्च अधिकारी वर्ग को प्रभावित किया।
उन्होंने वर्ष 1962 से लेकर 1971 तक देश की रक्षा में कई महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में भाग लिया। ऑपरेशन राजी (1962-63 और 1963-64), ऑपरेशन हॉरनेट (1965) और ऑपरेशन कैक्टस लिली (1971) जैसे अभियानों में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान वे सांबा सेक्टर में अग्रिम मोर्चे पर तैनात थे, जहाँ 8 दिसंबर को दुश्मन के गोले से वे बुरी तरह घायल हुए। उनके पेट में छर्रे लगे, बाएं कान की श्रवण शक्ति चली गई और शरीर में आंतरिक चोटें आईं। इसके बावजूद वे डटे रहे और अपने घायल साथियों की रक्षा करते हुए उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया।
घायल अवस्था में वे दिल्ली और पठानकोट के सैन्य अस्पतालों में लंबे समय तक जीवन-मृत्यु से संघर्ष करते रहे। डॉक्टरों ने उन्हें मृतप्राय घोषित किया, परंतु उन्होंने जीवटता का परिचय देते हुए जीवन की ओर वापसी की। इस कठिन काल में उनकी पत्नी श्रीमती राजकंवर ने अनन्य सेवा, त्याग और तप से उनका साथ निभाया। वे स्वयं उनके घाव धोतीं, छर्रे निकालतीं और उन्हें सहारा देती रहीं। यही नहीं, वर्ष 1984 में जब उन्हें थायरॉयड की समस्या हुई, तो मुंबई स्थित नौसेना अस्पताल में उन्हें रेडियो आयोडीन थेरेपी दी गई, जिसकी अधिक मात्रा से उन्हें क्रोनिक मायलॉयड ल्यूकेमिया नामक गंभीर रक्त कैंसर हो गया। इसी बीमारी के चलते 31 मार्च 1988 को वे सेवानिवृत्त हुए और 20 अप्रैल 1988 को उन्होंने वीरगति प्राप्त की।
उनकी मृत्यु सेवा से उत्पन्न बीमारी के कारण हुई थी, परंतु इसके बावजूद सेना ने उनकी पत्नी को केवल साधारण पारिवारिक पेंशन प्रदान की। जबकि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य है कि उन्हें 100% से अधिक स्थाई चिकित्सा अक्षमता होने पर भी सेना में बनाए रखा गया था, जो यह दर्शाता है कि वे सेवायोग्य और अनिवार्य समझे गए। वर्ष 2009 में संशोधित नियमों के अनुसार, ऐसे मामलों में सेना मुख्यालय द्वारा निकटतम परिजन को “आर्मी वेलफेयर फंड” से ₹1,00,000 की एकमुश्त सहायता दी जानी चाहिए थी, परंतु यह वैधानिक अधिकार भी उन्हें नहीं मिला।
यह ध्यान देने योग्य है कि “डिस्चार्ज प्रमाणपत्र” में हरि सिंह परमार के चरित्र को “उत्कृष्ट” बताया गया है। उन्हें सैन्य सेवा में अद्वितीय योगदान के लिए अनेक सम्मान और पदक प्रदान किए गए, जिनमें सामान्य सेवा पदक 1947, नागा हिल्स रक्षा पदक, समर सेवा स्टार 1965, हिमालय संग्राम पदक, पश्चिमी स्टार, 25वीं स्वतंत्रता जयंती पदक, घाव पदक, और लंबी सेवा के लिए 9, 20 व 30 वर्षों के पदक सम्मिलित हैं। यह सब सिद्ध करता है कि उनका सेवा जीवन गौरवशाली और अनुकरणीय था।
वर्ष 2023 में, जब श्रीमती राजकंवर को न्यायिक विकल्प की जानकारी मिली, तब उन्होंने अधिवक्ता विजय कुमार पाण्डेय और संदीप त्रिपाठी के माध्यम से सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, लखनऊ खण्डपीठ में याचिका दायर की। याचिका में यह स्थापित किया गया कि मृत्यु का कारण सैन्य सेवा से उत्पन्न विकृति थी और वे विशेष पारिवारिक पेंशन की अधिकारी थीं।
16 जुलाई 2025 को माननीय न्यायमूर्ति सुरेश कुमार गुप्ता (सेवानिवृत्त) एवं मेजर जनरल संजय सिंह (सेवानिवृत्त) की खण्डपीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया कि श्रीमती राजकंवर को 21 अप्रैल 1988 से विशेष पारिवारिक पेंशन प्रदान की जाए और साथ ही तीन वर्षों का बकाया भुगतान भी किया जाए। यह निर्णय न केवल एक वीर सैनिक के बलिदान को न्यायसंगत मान्यता देता है, बल्कि उसकी पत्नी के वर्षों के तप, सेवा और संघर्ष को भी न्यायिक सम्मान प्रदान करता है। यह गाथा यह सिद्ध करती है कि सच्चा शौर्य केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध डटे रहने में भी निहित होता है।


