
*मिला थोक में घाटा*
*गीत✍🏻 उपमेंद्र सक्सेना* एडवोकेट
लड़ा भूख से अच्छे दिन का
कुछ दिन चावल, आटा।
चिढ़ा रहे हैं नोन, तेल, घी
और दवा के पर्चे
एक जरूरत पूरी होती
खड़े दूसरे खर्चे
समय चक्र ने उम्मीदों के
जड़ा गाल पर चाटा।
उनकी ही होती है भर्ती
जो हैं हट्टे – कट्टे
लगे कहाँ लँगड़े घोड़़ों पर
कभी रेस में सट्टे
वणिक व्यवस्था ने निष्ठा को
किया दूर से टाटा।
सिसक रहे श्रम के अड्डे पर
बुढ़ा गए जो सपने
दिखी हाँफती भरी जवानी
दीन हाल पर अपने
व्यर्थ हुए सिद्धांत यहाँ जब
मिला थोक में घाटा।
मत पूछो तुम आज आस्था
जीवन कैसे जीती
कुटिल जगत का गरल निरंतर
नैतिकता है पीती
लगे गात को रोग पेट को
तंगी ने जब काटा।
नन्ही ज़िद तकिए के नीचे
रखकर बच्चे सोते
पड़े जहाँ खाने के लाले
शौक अधूरे रोते
चालाकी ने कभी आर्थिक
खाई को कब पाटा?
विश्वासों ने तोड़ दिया दम
संयम की चौखट पर
छोड़ रही है साथ निकटता
विपदा की आहट पर
बाँध लिया आडंबर ने अब
संवेदन का ढाटा।
उठो वंचितों का अब मिलकर
चलो बँधाए संबल
करें आंदोलन कुछ ऐसा
हो जंगल में मंगल
पेंच योजना के हों ढीले
फीड उचित हो डाटा।
*रचयिता ✍🏻उपमेंद्र सक्सेना* एडवोकेट
‘कुमुद-निवास’, बरेली (उत्तर प्रदेश)
मोबा.- 98379 44187


